झारखंड में संताल आदिवासियों को सबसे बड़ा मेला: संतालियों की संस्कृति और परंपरा का उद्गम स्थल है लुगु बुरु, देश विदेश से आते है श्रद्धालु

3 मिनट पहले

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झारखंड में संताल आदिवासियों को सबसे बड़ा मेला - Dainik Bhaskar

झारखंड में संताल आदिवासियों को सबसे बड़ा मेला

झारखंड में संताल आदिवासियों का सबसे बड़ा धार्मिक मेला लगा है। बोकारो जिले के गोमिया के ललपनिया में आज से मेले की शुरुआत हुई है। पहाड़ पर आज से लोग इस अंतरराष्ट्रीय धर्म महासम्मेलन के इस आयोजन में शामिल हो रहे हैं। इस मेले का खास महत्व है, कार्तिक पूर्णिमा पर लाखों संथाल आदिवासी इसमें शामिल हो रहे हैं। देशभर से लोग इसमें शामिल होते हैं।यहां लुगू बाबा ने संतालिया को धर्म का ज्ञान दिया था।

पहाड़

पहाड़

लुगु बुरु घांटाबाड़ी धोरोमगाढ़ में हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संताल सरना धर्म महासम्मेलन में देश के साथ – साथ विदेशों से भी लोग शामिल होते हैं जिसमें बिहार, बंगाल, ओड़िशा, असम, मणिपुर, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और कई देशों के श्रद्धालु मत्था टेकने आते हैं। इस सम्मेलन में धर्म, भाषा, लिपि व संस्कृति को उसके मूल रूप में संजोये रखने, प्रकृति की रक्षा का संकल्प लेते हैं। संतालियों की संस्कृति व परंपरा का उद्गम स्थल है लुगु बुरु। लुगु बाबा की अध्यक्षता में यहीं संताली समाज के रीति-रिवाज बने थे। लुगु बुरु झारखंड के बोकारो जिला के ललपनिया में है। यहां लुगु बुरु घांटाबाड़ी धोरोमगाढ़ संतालियों के लिए खास महत्व रखता है।

क्या है इतिहास
साल 1368 ई में छोटानागपुर के महाराजा ने इस क्षेत्र को बाघ सिंह देव को बंदोबस्त कर दिया गया । दस्तावेजों पर नजर डालेंगे तो पायेंगे 1704 ई में एकरारनामा कर महाराज हेमंत सिंह ने ठाकुर त्रिभुवन सिंह को होसिर, साड़म आदि 28 गांवों के साथ बंदोबस्त कर दिया गया। इसके साथ ही लुगू पहाड़ इनके अधिकार क्षेत्र में आ गया। उस समय क्षेत्र काफी बड़ा था जो साड़म परगना था। बाघदेव सिंह देव के वंशज ठाकुर त्रिभुवन सिंह के चार पुत्र संग्राम राय, लक्ष्मण राय, महालोंग राय एवं कुशल राय हुए। इनमें कुशल राय और लक्ष्मण राय नि:संतान रहे। संग्राम राय और महालोंग राय के बीच बंटवारा हुआ। इसमें महाराजा दलेल सिंह मौजा होसिर और कई गांव महलौंग राय के हिस्से में आ गया और साड़म के कई गांव संग्राम सिंह के हिस्से में आ गये।

संताली संविधान की रचना

हजारों-लाखों साल पहले इस स्थान पर लुगु बाबा की अध्यक्षता में संतालियों के जन्म से लेकर मृत्यु तक के रीति-रिवाज यानी संताली संविधान की रचना हुई थी। मान्यता है कि इसमें 12 सालों का वक्त लग गया। संतालियों की 12 साल तक मैराथन बैठक हुई। संताली गीत में एक जगह गेलबार सिइंया, गेलबार इंदा यानी 12 दिन, 12 रात का भी जिक्र आता है यानि बैठक भी लंबे समय तक होती थी। लुगुबुरु घांटाबाड़ी देश-विदेश में निवास कर रहे हर एक संताली के लिए गहरी आस्था का केंद्र है।। उनके गौरवशाली अतीत से जुड़ा महान धर्मस्थल है। संताली समाज के हर रिवाज में लुगु बुरु की चर्चा है। लुगु बुरु मार्ग में ऐसी कई चट्टानें हैं, जहां से श्रद्धालु चट्टानों को खरोंचकर अवशेष अपने साथ ले जाते हैं। इससे संतालियों की लुगु बुरु के प्रति आस्था व विश्वास को समझा जा सकता है।

झरना का विशेष महत्व

बगल से बहने वाली पवित्र सीता झरना के पानी का उपयोग पेयजल के रूप में करते हैं। यह करीब 40 फुट नीचे गिरता है। संताली इसे सीता झरना कहते हैं। कई जगहों पर इसे छरछरिया झरना भी कहा जाता है। इसके जल को संताली गाय के दूध के समान पवित्र मानते है। मान्यता यह भी है कि झरने के पानी का लगातार सेवन करने से कब्जियत, गैस्टिक और चर्म रोग दूर हो जाती है।

सात किमी ऊपर तक है गुफा

इसी गुफा से आते थे लुगु बाबा

इसी गुफा से आते थे लुगु बाबा

झारना के पास ही एक गुफा है। इसे लुगु बाबा का छटका कहते हैं। मान्यता है कि लुगुबुरु यहीं स्नान करते थे और इसी गुफा के जरिये वे सात किमी ऊपर स्थित घिरी दोलान (गुफा) तक आवागमन करते थे। मान्यता यह भी है कि लुगु बुरु के सच्चे भक्त आज भी इस गुफा के जरिये ऊपर गुफा तक पहुंच सकते हैं।

कब से हुई सम्मेलन की शुरुआत
सम्मेलन की शुरुआत वर्ष 2001 में हुई थी । देश-विदेश के संतालियों को एकसूत्र में बांधने के उद्देश्य से इसकी शुरुआत की गयी। इसका खूब प्रचार प्रसार हुई इसके लिए समिति बनी। इसे अब राजकीय महोत्सव का दर्जा प्राप्त है। 10 लाख से अधिक श्रद्धालु साल के दो दिनों में यहां मत्था टेकते हैं।

कैसे होती है पूजा
संतालियों की अपने आराध्यों की उपासना के प्रमुख धार्मिक स्थानों में जाहेरगढ़ होता है। यहां सखुआ के बड़े-बड़े पेड़ होते हैं। यहां संताली अपने सभी देवी-देवताओं का आह्वान कर उनकी पूजा करते हैं। संताली यहां सर्वप्रथम मरांग बुरु, फिर जाहेर आयो, लीट्टा गोसाईं, मोड़े को और तुरुई को देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। खास बात यह भी है कि संताली अपनी उपासना में प्रकृति की सुरक्षा की मन्नत भी मांगते हैं। यहां सरना अनुयायी पूजा करते हैं। इसलिए इस स्थल को आम भाषा में सरना स्थल भी कहा जाता है।

कैसे पहुंचे
रांची से 90 किलोमीटर, सड़क मार्ग से दो रास्ते से ललपनिया पहुंच सकते हैं। पेटरवार-गोमिया रूट और रामगढ़-नयामोड़ रूट। ललपनिया से 17 किमी की दूरी पर गोमिया रेलवे स्टेशन और 33 किमी की दूरी पर रांची रोड रेलवे स्टेशन है।

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